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प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः। मंत्रमूलबलेनान्ये यः प्रियः प्रिय एव सः।।

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सनातन किरण (41)

प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः।
मंत्रमूलबलेनान्ये यः प्रियः प्रिय एव सः।।
सन्दर्भ – सातवाँ अध्याय, श्लोक संख्या 03, विदुर – नीति, महाभारत उद्योगपर्व से ।

अर्थ – संसार में कोई मनुष्य दान देने से प्रिय होता है, दूसरा प्रिय वचन बोलने से और तीसरा मंत्र तथा औसध के बल से प्रिय होता है, किंतु जो वास्तव में प्रिय है, वह तो सदा ही प्रिय ही है।

सार – संसार में जिस व्यक्ति को जो प्रिय (प्यारा) हैं वे सदा उनके लिए प्रिय ही होते हैं, दानी अपने दान देने के कारण प्रिय होता है, प्रिय और मीठी वचन या बात करने वाले भी प्रिय ही होते हैं तथा जिस व्यक्ति को मन्त्रों का ज्ञान होता है और उनमें उन मन्त्रों के सिद्ध करने की शक्ति होती है वे भी प्रिय ही होते हैं और साथ में वैद्य या चिकित्सक जो लोगों के बीमारियों को अपने औषध के प्रयोग से ठीक करते हैं वे भी संसार में प्रिय ही होते हैं लेकिन परमात्मा की नजर में प्रिय बनने हेतु भक्ति का मार्ग अपनाकर और मनुष्यों सहित जीवों के कल्याणार्थ कार्य कर कोई भी प्रिय हो सकता है।


-अजीत सिन्हा-धार्मिक व आध्यात्मिक चिंतक 05नवंबर 2022 दिन शनिवार मोबाइल नम्बर -6202089385  आपका दिन शुभ हो🙏


 

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