2022 के चुनाव से पहले फिर मायावती का BSP से ‘छंटनी’ अभियान – बहुजन इंडिया 24 न्यूज

2022 के चुनाव से पहले फिर मायावती का BSP से ‘छंटनी’ अभियान

1 min read
😊 Please Share This News 😊

बहुजन इंडिया 24 न्यूज़ व बहुजन प्रेरणा दैनिक समाचार पत्र -संपादक मुकेश भारती संपर्क सूत्र -9161507983

जौनपुर ब्यूरो चीफ -संतोष कुमार गौतम


2022 के चुनाव से पहले फिर मायावती का ‘छंटनी’ अभियान, BSP को महंगा न पड़ जाए ये कदम

रामअचल राजभर और लालजी वर्मा बसपा

बसपा प्रमुख मायावती के कहर का शिकार कब, कौन, कहां और कैसे हो जाए कहा नहीं जा सकता. मायावती ने तो उन नेताओं को भी नहीं बख्शा, जिन्हें उनका करीबी माना जाता था. पार्टी में जिस नेता पर माया की नजर टेढ़ी हुई, उसे बाहर जाना ही पड़ा है. इसमें फिर चाहे उनके मजबूत सिपहसलार हो या फिर पार्टी संस्थापक कांशीराम के साथी. इस बार उन्होंने पार्टी में बड़ी कार्रवाई करते हुए बसपा विधानमंडल दल के नेता लालजी वर्मा और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व राष्ट्रीय महासचिव राम अचल राजभर को बसपा से निष्कासित कर दिया है।

रामअचल राजभर और लालजी वर्मा बसपा के संस्थापक सदस्यों में से थे और कांशीराम के समय से पार्टी में जुड़े हुए रहे थे. दोनों ही नेतातों के बसपा से निष्कासित करने की कार्रवाई के बाद पत्र जारी कर कहा है कि इन्हें अब पार्टी के न तो किसी कार्यक्रम में बुलाया जाएगा और न ही बसपा की तरफ से कभी चुनाव लड़ाया जाएगा. इन दोनों दिग्गज नेताओं को पार्टी से निकाले जाने के बाद यूपी की राजनीति में सरगर्मियां और तेज हो गई हैं।

मायावती पांच चार साल में अपने 11 विधायकों को बसपा से बाहर का रास्ता दिखा चुकी है, जिसके चलते पार्टी के पास महज सात विधायक ही बचे हैं. हालांकि, मायावती हर चुनाव से पहले अपने कुछ नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाती रही हैं, लेकिन इस बार उन्होंने अपने सबसे मजबूत सिपहसलार पर गाज गिराई है. मायावती के इस एक्शन से पार्टी के सामने ओबीसी समुदाय को साधने की चुनौती खड़ी हो गई है, क्योंकि फिलहाल पार्टी में ओबीसी समुदाय का कोई बड़ा नेता नहीं बचा है पार्टी के पास।
रामअचल और लालजी मायावती के करीबी थे
बता दें कि बसपा के इन दोनों नेताओं को मायावती का करीबी माना जाता था, जिसके चलते पार्टी में इनका कद काफी बड़ा था. रामअचल राजभर बसपा सरकार में महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे हैं. इसके अलावा वो लंबे समय तक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी को भी निभाया. वहीं, लालजी वर्मा भी अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालते रहे हैं और बसपा विधायक दल के नेता थे. वहीं, मायावती ने आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर विधानसभा सीट से विधायक शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को बसपा विधानमंडल दल का नेता नामित किया है।

2017 के विधानसभा में बसपा यूपी में महज 19 सीटों पर सिमट गई थी, जिसमें सबसे ज्यादा चार विधायक अंबेडकरनगर से जीते थे. खास बात यह है कि दोनों ही नेता अंबेडकरनगर से विधायक हैं. रामअचल राजभर अंबेडकरनगर के अकबरपुर से विधायक हैं जबकि लालजी वर्मा कटेहरी विधानसभा से विधायक हैं. मायावती खुद भी इसी अंबेडकरनगर सीट से जीत दर्ज करती रही हैं. बसपा के मजबूत गढ़ माने जाने वाले जिलो में से एक था, जहां फिलहाल महज एक विधायक ही पार्टी के पास बचा है।
बसपा से ओबीसी चेहरा साफ हो गए
मायावती के 2012 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी पिछड़े वर्ग के ये दो बड़े नेता बसपा में बने हुए थे. राम अचल राजभर अतिपिछ़़ड़ा राजभर समाज से आते हैं जबकि लालजी वर्मा की कुर्मी समाज से हैं. ऐसे में पार्टी से निष्कासन इन नेताओं के लिए से कहीं ज्यादा बसपा के लिए भी बड़ा झटका माना जा रहा हैं. पिछले कुछ सालों में पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य सहित बसपा में पहली कतार के सभी प्रमुख पिछड़े नेता या तो बसपा छोड़ चुके हैं या निष्कासित किये जा चुके हैं. ऐसे में मायावती ओबीसी समुदाय को कैसे पार्टी में जोड़ेंगी।
बसपा के पास सिर्फ सात विधायक बचे
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में कुल 403 सीटें में से बसपा महज 19 सीटें जीतने में सफल रही थी. मायावती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में बसपा के 9 विधायक पहले से निलंबित चल रहे हैं. इन दो विधायकों के पार्टी से निष्काषन के बाद पार्टी के अब तक निष्कासित विधायकों की संख्या 11 पहुंच गई है और एक सीट उपचुनाव में गवां चुकी हैं. इस तरह से अब केवल 7 विधायक ही पार्टी में बचे हैं. रामअचल राजभर, लालजी वर्मा, असलम राइनी, असलम अली, मुजतबा सिद्दीकी, हाकिम लाल बिंद, हरगोविंद भार्गव, सुषमा पटेल, वंदना सिंह, अनिल सिंह और रामवीर उपाध्याय को बसपा के मायावती बाहर कर चुकी हैं।
कांशीराम के साथी छोड़े गए हाथी का साथ
कांशीराम ने दलित समाज के हक और हुकूक के लिए पहले डीएस-4, फिर बामसेफ और 1984 में दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज के वैचारिक नेताओं को जोड़कर बहुजन समाज पार्टी का गठन किया. देश के कई राज्यों में बीएसपी का जनाधार बढ़ने लगा. इसी कड़ी में कांशीराम के संपर्क में मायावती आईं तो उत्तर प्रदेश में बीएसपी को एक नई ताकत मिली।

साल 1993 में बीएसपी ने एसपी के साथ मिलकर यूपी में सरकार बनाई और फिर तो पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. एक के बाद एक कामयाबी की सीढ़ी मायावती भी चढ़ती गईं. 2007 में तो बीएसपी ने सूबे में ऐतिहासिक जीत का परचम फहराया, लेकिन इस सफर में कांशीराम के वो सभी साथ बीएसपी से दूर हो गए या फिर उन्हें बाहर कर दिया गया, जो कभी पार्टी की जान हुआ करते थे।
बसपा छोड़ने वाले नेताओं की फेहरिश्त
बसपा छोड़ने वाले दिग्गज नेताओं में राज बहादुर, डॉक्टर मसूद अहमद, सुधीर गोयल, बरखूराम वर्मा, राम लखन वर्मा, जंगबहादुर पटेल, आरके पटेल और सोने लाल पटेल भी कांशीराम के दाहिने हाथ माने जाते थे, लेकिन मायावती के प्रकोप से ये भी नहीं बच सके. इसके अलावा रमाशंकर पाल, एसपी सिंह बघेल, स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, राजवीर सिंह, पूर्व मंत्री अब्दुल मन्नान, उनके भाई अब्दुल हन्नान, राज्यसभा सदस्य रहे नरेंद्र कश्यप और रामपाल यादव

इसी तरह कांशीराम के साथी रहे राज बहादुर, राम समुझ, हीरा ठाकुर और जुगल किशोर और कैप्टन सिकंदर रिजवी भी पार्टी छोड़ गए. आरके चौधरी,इंद्रजीत सरोज, रामवीर उपाध्याय व जुगुल किशोर जैसे कुछ नाम हैं, जिनको मायावती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में पाने के बाद बाहर करने में एक मिनट का भी समय नहीं लिया. हालांकि, इन नेताओं के पार्टी के बाहर किए जाने के बाद से पार्टी लगातार कमजोर होती जा रही है।

फिलहाल बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को छोड़ दें, तो पार्टी का जो भी नेता मायावती के ज्यादा करीब पहुंचा, बहुत जल्द ही किनारे हो गया और फिर सीधे पार्टी से बाहर. कांशीराम के साथियों में से अब सिर्फ सुखदेव राजभर ही पार्टी में बचे हैं, लेकिन उम्र के ऐसे दलहीज पर हैं, जहां वो पार्टी के लिए बहुत कुछ नहीं कर सकते. ऐसे में मायावती बीएसपी को किन कर्णधारों के साथ आगे बढ़ाएंगे ये वही जानती हैं।https://youtu.be/AksfiLuk_tE

व्हाट्सप्प आइकान को दबा कर इस खबर को शेयर जरूर करें 

स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे

Donate Now

[responsive-slider id=1466]
error: Content is protected !!