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मैं बोलूँगा तो बोलोगे कि बोलता है -सभी हिंदुओं को आर्यसमाजी होना चाहिए-डॉ संजय श्रीवास्तव

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मैं बोलूँगा तो बोलोगे कि बोलता है -सभी हिंदुओं को आर्यसमाजी होना चाहिए

संवाददाता ::: Date ::13 .11 .2022 : :अगर ये कहा जाए कि सारे हिंदुस्तानियों को आर्यसमाजी होना चाहिए तो ये अतिश्योक्ति कतई नही होगी।आर्यसमाज की स्थापना जब दयानंद सरस्वती जी के द्वारा की गई थी तो उसके दो मूलभूत सिद्धांत थे जिसके ऊपर आर्यसमाज का पूरा दर्शन आधारित था।पहला ये कि ईश्वर निराकार और एक है दूसरा ये कि जातीय व्यवस्था किसी भी तरह से समाज के हित में नही है।अगर आप दुनिया के किसी भी धर्म का विश्लेषण करेंगे तो आप सभी धर्मों में कमोबेश यही बात पाएंगे।ईसाई धर्म में भी जातीय व्यवस्था नही है जो दुनिया में सबसे बड़ा अपनाया जाने वाला धर्म है।उसके बाद इस्लाम धर्म का नंबर आता है, यहाँ भी ईश्वर उनके अल्लाह के रूप में सबसे बड़ा स्वरूप है और उनके यहाँ भी जातीय व्यवस्था नही है परंतु क्षेत्र के आधार पर कुछ हद तक उनमें भी थोड़ी बहुत उच्च वर्ग और निम्न वर्ग की गुंजाइश है जैसे कि उनके यहाँ शेख, पठान आदि अपने आप को श्रेष्ठता की श्रेणी में रखते हैं और शिया या सुन्नी का झगड़ा भी चलते रहता है परंतु धर्म के नाम पर सब एकजुट हो जाते हैं क्योंकि नमाज़ मस्जिद में ही पढ़ी जाती है और वहाँ किसी भी तरह की भेदभाव की गुंजाइश खत्म हो जाती है। मैं बोलूँगा तो बोलोगे कि बोलता है -सभी हिंदुओं को आर्यसमाजी होना चाहिए।

जैन, बौद्ध या सिख धर्म के अनुनायी भी ईश्वर के निराकार स्वरूप को मानते हैं और उनके यहाँ भी जातीय भेदभाव कदापि नही है।जैन धर्म के मानने वाले सारे जैनी ही कहलाते हैं और यही बात बौद्ध धर्म या सिख धर्म के मानने वालों के यहाँ भी है।यहूदी या पारसी धर्म के मानने वालों का भी वही हाल है।लेकिन हिन्दू धर्म जो दुनिया के ज्ञात धर्मों में सबसे प्राचीनतम धर्म है और इसलिए इसे सनातन धर्म की संज्ञा दी जाती है क्योंकि इसका प्रादुर्भाव कब और कैसे हुआ इसकी कोई ठोस जानकारी अपने पास उपलब्ध नहीं है।महाभारत काल और उसके हजारों साल पहले रामायण काल के बारे में ठीक ठीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। और हिन्दू धर्म उसके पहले से चला आ रहा है।दरअसल हिन्दू धर्म केवल धर्म ना होकर एक दर्शन रहा है।जब भारत का भूखंड आर्यव्रत कहलाता था तो उसकी सीमाएँ भौगोलिक दृष्टि से बहुत व्यापक थी।श्रीलंका से लेकर वर्मा तक और सारा अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश आर्यव्रत के ही हिस्से थे।सम्राट अशोक और सम्राट चंद्रगुप्त के समय भारत अपनी भौगोलिक स्थिति से अपने शीर्ष काल मेंथे। लेखक:डॉ संजय श्रीवास्तव :सोशल मीडिया के व्हाट्सएप पर शेयर खबर दिनाँक 12 नवंबर 2022सम्पर्क सूत्र :7000586652

बुनियादी तौर पर जब हम हिन्दू धर्म का आकलन करेंगें तो हमें अपने वैदिक काल की तरफ लौटना होगा।वैदिक काल के पहले का इतिहास केवल एक अनुमान पर आधारित है क्योंकि जब पाँच हजार पहले की हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के इतिहास के बारे में हम कुछ पता नहीं लगा सके तो उसके पहले क्या हुआ होगा ये सिर्फ शोध का विषय हो सकता है।धर्म के हिसाब से जब आकलन किया जाएगा तो वैदिक काल को स्वर्णिम काल में अंकित किया जाएगा। हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांत उसी काल खंड में प्रतिपादित किये गए थे।उस समय वर्ण व्यवस्था थी और कर्मकांड के रूप में यज्ञ का प्रचलन था हवन या होम द्वारा अपने इष्टदेव की आराधना की जाती थी।पुराणों की रचना के बाद कर्मकांड अपने स्तित्व मे आया और ईश्वर को साकार रूप में पूजने की शुरुआत भी उसके बाद की ही देन है।वैसे रामायण या महाभारत काल में भी देवी को पूजने की परंपरा थी।लेकिन मंदिर के अवशेष उस काल खंड के उपलब्ध नहीं हैं।नवीं या दसवीं सदी से मंदिरों का निर्माण और मूर्ति पूजा अपने व्यापक स्वरूप में आया।हिन्दू समाज वर्ण व्यवस्था से जातीय व्यवस्था में कैसे तब्दील हो गया ये बहुत अद्भुत बात रही।और यहीं से हिन्दू समाज का पतन होने लगा।समाज के एक बड़े वर्ग को समाज की मुख्य धारा से अलग कर दिया गया।समाज का एक हिस्सा अछूत वर्ग की श्रेणी में आ गया जो हिन्दू समाज की एकता के लिए अभिशाप सिद्ध हुआ।


लेखक:डॉ संजय श्रीवास्तव :सोशल मीडिया के व्हाट्सएप पर शेयर खबर दिनाँक 12 नवंबर 2022सम्पर्क सूत्र :7000586652

गौतम बुद्ध या महावीर जैन ने इसे तोड़ने का प्रयास किया परन्तु वे व्यापक तौर कुछ खास नही कर सके। सिख कौम भी एक हिस्से तक ही सिमट कर रह गया।हिंदुओं में जातीय व्यवस्था एक कोढ़ की तरह हो गया।भारत में इस्लाम के आगमन के बाद व्यापक स्तर पर हिंदुओं का इस्लाम धर्म अपनाने का सिलसिला चल पड़ा कुछ सामाजिक मजबूरी और कुछ आर्थिक मजबूरी।हिन्दू धर्म के निम्न वर्ग के लोगों ने सामाजिक सम्मान पाने के लिए इस्लाम धर्म अपना लिया।जजिया कर से छुटकारा पाने के लिए उस समय बहुत से हिंदुओं ने इस्लाम धर्म अपनाया।इन जातीय भेदभाव और मूर्ति पूजा एवं कर्मकांड के विरोध में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्यसमाज की नींव रखी।जबतक वे जीवित रहे इसका प्रचार प्रसार बहुत व्यापक तौर पर होता रहा और बहुत से लोग उनके सिद्धांतो को मानकर आर्यसमाजी बने भी। उच्च वर्ग में उनकी ख्याति बढ़ी और लोग आर्यसमाज के सिद्धांतों से बहुत प्रभावित भी हुए लेकिन उनके अचानक मौत से उनके उत्तराधिकारी का चयन सही तौर पर नही हो सका और जो बने वे आर्यसमाज को जिस दिशा में आगे ले जाना था उसमें विफल रहे।आर्यसमाज के जितने भी केंद्र थे उसपर वहाँ के लोगों ने अपनी पैतृक संपत्ति समझकर कब्जा कर लिया।कालांतर में तो आर्यसमाज के जितने भी संस्थान थे वहाँ केवल शादी का पंजीयन होने लगा।किसी को अपनी जाति बिरादरी से अलग शादी करनी होती वे आर्यसमाज में आकर शादी करते और उसको कानूनी जामा पहना देते।आम जनता आर्यसमाज के संस्थानों को सिर्फ इसी नजर से देखने लगे कि यहां शादी करवाई जाती है।जिन सिद्धांतो को लेकर इस समाज की स्थापना हुई वह गौण हो गया।आम आदमी जो स्वामी दयानंद सरस्वती जी के विचारों से प्रभावित होकर आर्यसमाज से जुड़ रहा था उनमें कमी आ गई।आमलोग आर्यसमाज के आदर्शों को समझने में विफल होने लगे और जो आर्यसमाज के अनुयायी रहे वे भी अपने इर्दगिर्द के लोगों को आर्यसमाज से नही जोड़ सके।लेखक:डॉ संजय श्रीवास्तव :सोशल मीडिया के व्हाट्सएप पर शेयर खबर दिनाँक 12 नवंबर 2022सम्पर्क सूत्र :7000586652 दरअसल किसी भी धर्म के प्रचार प्रसार में उस धर्म के प्रवर्तक से ज्यादा उनके उत्तराधिकारी और अनुयायियों के हाथ होता है।आज इस्लाम दुनिया का सबसे बड़ा अपनाया जाने वाला धर्म इसलिए है कि मोहम्मद पैगम्बर के बाद उनके अनुयायियों ने पूरी शिद्दत से उस धर्म को फैलाने का काम किया।लेकिन आर्यसमाज के सिद्धांत सबसे बेहतर होने के बावजूद वह मुकाम हासिल नहीं कर सका।शुरुआती दौर में जब लोग आर्यसमाज से जुड़े तो वे पूरी तरह उसके सिद्धांतो को अपनाया।मूर्ति पूजा छोड़ी साथ में जातीय बंधन भी तोड़ने का कार्य किया।लेकिन बाद में ये स्थिति हो गई कि आर्यसमाज से ऐसे लोग जुड़ गए जो आर्यसमाज के कार्यक्रम में हिस्सा तो जरूर लेते लेकिन अपने हिन्दू वादी नीतियों को नही छोड़ा।जाति प्रथा के बंधन में बंधे रहे घर में मूर्ति पूजा और बाकी कर्मकांड भी निभाते रहे।इसका परिणाम ये हुआ कि आमलोगों का आर्यसमाज से विश्वास उठने लगा।जब आम जनता ये देखने लगी कि एक व्यक्ति अपने आप को आर्यसमाजी कहता है लेकिन वह अपने जाति गत प्रथाओं को नही छोड़ रहा है।अपनी लड़के या लड़की की शादी अपने ही जाति के लड़के या लड़कियों से कर रहा है।एक तरफ आर्यसमाज के कार्यक्रम में हवन भी कर आता है और दूसरी तरफ घर मे सत्यनारायण भगवान की कथा भी करवा रहा है।इस दोहरे मापदंड के कारण लोगों का विश्वास आर्यसमाज पर से डिगने लगा।आप किसी को शराब पीने से तभी मना कर सकते हो जब आप खुद शराब पीना छोड़ दोगे।दूसरों को पीने से मना करो और खुद पियोगे तो आपके बात का कोई महत्व नही रहेगा।आज आर्यसमाज में ऐसे कर्मठ लोगों की आवश्यकता है जो निस्वार्थ भाव से आर्यसमाज के सिद्धांतों को आम जनता तक पहुंचाएं।और सबसे पहले अपने आप को कट्टर आर्यसमाजी बनाएं।देशभर के सभी आर्यसमाज के संस्थानों को कमाई का जरिया मत बनाएं।आर्यसमाज से जुड़े लोग ये प्रयत्न करें कि रोज एक ना एक व्यक्ति को आर्यसमाज से जोड़ें।आप अपने व्यक्तित्व ऐसा बनाएं कि आपसे प्रभावित होकर लोग खुद आर्यसमाज से जुड़ने की चेस्टा करें।
।इसके अलावा जो लोग आर्य समाज से जुड़े हुए हैं उन लोगों को अपने सरनेम से जाति सूचक शब्द को हटाना चाहिये जैसे मोहन पाटीदार को सिर्फ मोहन आर्य लिखना चाहिए।और दूसरा ये कि आर्य समाज के लोगों को किसी भी जातीय सम्मेलनों में जाने से बचना चाहिए। आज समाज को आर्यसमाज के सिद्धांतों पर चलने की आवश्यकता है।हिन्दू अगर जाति व्यवस्था के कारण एकजुट नहीं हुआ तो वह दिन दूर नही कि आपका स्तित्व खतरे में आ जाये।जिस तरह एक धर्म के लोगों की जनसंख्या बढ़ रही है उससे आप कब बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक में आ जाएं ये कहना मुश्किल है।इसलिए आज हिंदुओं को एक ईश्वर और एक जाति के सिद्धांतों को अपनाना ही होगा। लेखक: डॉ संजय श्रीवास्तव महू :-7000586652

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