Ibn Batuta :इब्न बतूता था तुगलिया साम्राज्य (तुगलक वंश) में दलित विरोधी काज़ी व प्रशासक : बहुजन प्रेस
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Dt.10 January 2023। Mukesh Bharti। इब्न बतूता था तुगलिया साम्राज्य (तुगलक वंश) में दलित विरोधी काज़ी व प्रशासक था
तुगलक वंश 1320 से 1414 तक भारत पर शासन किया
इब्न बतूता था तुगलिया साम्राज्य (तुगलक वंश)में दलित विरोधी काज़ी व प्रशासक था:बहुजन प्रेस
History: Ibn Batuta: इब्न बतूता का जन्म 1304 में और मृत्यु 1377 में हुई उसने दिल्ली में कुछ साल गुजारे और तुगलिया साम्राज्य (तुगलक वंश) में काज़ी के पद पर था आसीन । जबतक इब्न बतूता दिल्ली में रहा , वह रोज डायरी लिखता था और काले और श्याम वर्ण के लोगो को पसन्द नहीं करता था उनको चोर कहता था। । भारतीय समाज पर पैनी नजर गड़ाये रखता था और कलम चलने की बात करे तो जब जब भी उसने कलम चलाई चमार पासी धोबी धानुक जैसे छोटी छोटी जातियों को उसने चोर कहने में तनिक भी नहीं शर्माया । मुगलिया साम्राज्य का यही प्रशासक था जिसने सरकारी रिकार्ड में आज के अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति के लोगो व शूद्रों को हिन्दू लिखा। 10 वी सन 1030 में मोहम्मद गजनवी के साथ भारत में आये फारसी इतिहासकार अल-बिरुनी ने पहली बार हिंदू शब्द का लिखित तौर पर प्रयोग किया था।
History: हिंदू शब्द फारसी भाषा के ” गया हूल सौगात” शब्दकोश से आया है। जिसका शाब्दिक अर्थ है – काला, चोर, बदमाश, काफिर, असभ्य, गुलाम।
रही बात लिखने की तो भारतीय समाज के खानपान के बारे में भी बहुत कुछ लिखा उसने अपनी डायरी में लिखा कि तुगलक के दरबार और उत्तर भारत में उड़द की दाल, समोसे और आम के अचार को लोग बहुत शौक से खाते हैं।
History: मोरक्को के महान घुमक्कड़ और लेखक इब्न बतूता (Ibn Battuta) यहां साल 1330 में आया था ।भारत आते समय रास्ते में इसने 3 शादिया की और उनसे बच्चे भी पैदा किया और उनको छोड़ कर भाग भी गया। भारत आने का मकसद केवल मोहम्मद बिल तुगलक के दरबार में नौकरी करना था। इब्न बतूता जब यहां आया तो सुल्तान तुगलक कन्नौज की यात्रा पर थे। सुल्तान तुगलक ने दिल्ली आने पर उन्हें अपने दरबार में नौकरी दे भी दी।
तुगलक वंश 1320 से 1414 तक भारत पर शासन किया
इब्न बतूता का संक्षिप्त जीवन परिचय : इब्न बतूता का पूरा नाम मुहम्मद बिन अब्दुल्ला इब्न बतूता था। इब्न बतूता एक इस्लामिक कट्टर विद्वान अफ़्रीकी यात्री था, जिसका जन्म 24 फ़रवरी 1304 ई. को उत्तर अफ्रीका के मोरक्को प्रदेश के प्रसिद्ध नगर तांजियर में हुआ था। इसके पूर्वजों का व्यवसाय काजियों का था।और शासन प्रशासन में उच्च पदों पर कार्य करते थे। पारिवारिक कटटरता और विद्वानता के कारण इब्न बत्तूता आरंभ से ही बड़ा धर्मानुरागी था। बतूता का भारत आने वाले यात्रियों में खास मुकाम है। उन्होंने अपने जीवन में करीब 75 हजार मील की यात्राएं की थीं। इतना लंबा सफर उस समय शायद ही किसी अन्य यात्री ने किया हो। कल्पना कीजिए कि कितने कठिन रास्तों को तय करके दिल्ली आए होंगे। उन्हें 1342 में मुहम्मद बिन तुगलक ने अपना राजदूत बनाकर भेजा चीन भेजा। इसके बाद उन्होंने पश्चिम एशिया, उत्तर अफ्रीका और स्पेन का सफर किया और अंत में टिंबकट आदि होते हुए 1354 में मोरक्को लौट गए।
History: क्या बत्तूता मिले हजरत निजामउद्दीन औलिया से:बतूता जब दिल्ली में रहता था , तब तक हजरत निजामउद्दीन औलिया साहब गुजर चुके थे। पर कहने वाले कहते हैं कि बतूत्ता फकीर की दरगाह में हाजिरी देने पहुँचता था । तारीखी निजामउद्दीन इलाके के चप्पे-चप्पे के इतिहास से वाकिफ शेख जिलानी कहते हैं कि बतूता कुछ समय तक निजामउद्दीन इलाके में रहे भी। माना जाता है कि जिधर गालिब साहिब की मजार है, उसके आसपास वह कहीं आते-जाते-रहते थे। अपने दिल्ली प्रवास और निजामउद्दीन इलाके में घूमते हुए इब्ने बतूता को यह तो पता चल ही गया होगा कि निजामउद्दीन औलिया और ग्यासुद्दीन तुगलक में छत्तीस का आंकड़ा रहा। वह जब दिल्ली का सुल्तान था, तब इसी दिल्ली में निजामउद्दीन औलिया मौज में रहते थे।
तुगलक वंश 1320 से 1414 तक भारत पर शासन किया
History: फकीर हजरत निजामउद्दीन औलिया के घर की रौनक:ग्यासुद्दीन तुगलक के तुगलकाबाद किले पर सन्नाटा पसरा रहता है, वहीं फकीर के घर पर उल्लास है, आनंद है। निजामउद्दीन औलिया में बसंत के पर्व पर मानों सारी दिल्ली उनके दर पर पहुंच जाती है। बसंत के रंग में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह रंगी नजर आई। बसंत ऋतु के आगमन की दिलकश छटा और गंगा-जमुनी तहजीब का संगम यहां देखने को मिलता है। बत्तूता के यात्रा संस्मरणों से ही पता चलता है कि उस दौर में भारत का डाक विभाग काफी विकसित हो गया था। खत घोड़ों पर सवार होकर भेजे जाते थे। हर चार मील पर घोड़ों पर सवार होकर डाक विभाग के मुलाजिम खत पहुंचाते थे। उन्हें हरेक चार मील की दूरी पर डाकिया मिलता था। घोडे पर सवार मुलाजिम उसे पत्र आदि थमा देते थे।
History: कब खाली हो गई थी दिल्ली:मोहम्मब बिन तुगलक
बतूता ने विस्तार से लिखा है कि जब मोहम्मब बिन तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से शिफ्ट करके दौलताबाद की तो उन्होंने यहां से नेत्रहीनों और दिव्यांगों को भी शिफ्ट कर दिया था। आप कभी तुगलकाबाद इलाके के आसपास से गुजरें तो तुगलकाबाद किले को देखकर मोरक्को और वहां की फुटबॉल टीम के साथ बतूता को याद कर लीजिए। इसकी ऊंची-ऊंची दीवारें गवाही देती हैं कि यह कभी बुलंद इमारत के रूप में खड़ा हुआ होगा।
History: इतिहासकार पर्सिवेल स्पियर कहते हैं, ‘मोहम्मद बिन तुगलक के पिता ग्यासउद्दीन तुगलक ने मंगोलों के हमलों से बचाव के लिए अपने इस किले का निर्माण करवाया था। इस कारण उसका खजाना खाली होता रहा।’ शायद ही कोई दिल्लीवाला होगा, जिसने महरौली-बदरपुर रोड पर उजाड़ पड़े तुगलकाबाद किले को नहीं देखा होगा। इस किले का निर्माण 1321 में शुरू हुआ था और यह केवल 4 साल में पूरा हो गया था।
इब्न बतूता एक विद्वान अफ़्रीकी यात्री था, जिसका जन्म 24 फ़रवरी 1304 ई. को उत्तर अफ्रीका के मोरक्को प्रदेश के प्रसिद्ध नगर तांजियर में हुआ था। इसके पूर्वजों का व्यवसाय काजियों का था। इब्न बत्तूता आरंभ से ही बड़ा धर्मानुरागी था। इब्न बतूता के पिता मोरक्को में काज़ी के पद पर आसीन थे जिस वजह से उसने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। 13 वीं शताब्दी में भारत दुनिया का विकसित देशों में एक था पश्चमी देशों के सभी विद्वान इस देश में आकर नौकरी और शासन करना चाहते थे।
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