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6 दिसंबर सन 1956कि वो काली रात्रि।

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6 दिसंबर सन 1956कि वो काली रात्रि।

सन 1956 की समय लगभग रात्रि के 12:00 बजे वह काली रात्रि का समय चारों तरफ सन्नाटा था अचानक संपूर्ण देश दुनिया में फोन व वायरलेस की घंटियां बजने लगी राजभवन मोना था। संसद मौन थी। राष्ट्रपति भवन मोन था। हर कोई बड़े ही असमंजस में था कि शायद कोई बड़ा हादसा या घटना हुई है। जी हां मैं बात कह रहा हूं कि यह घटना बड़े हादसे या प्रलय से कम नहीं थी हां हम बात कर रहे हैं उन करोड़ों करोड़ों दलितों शोषित वंचितों कमजोर के मसीहा परम पूजनीय ज्ञान के अथाह सागर सिंबल ऑफ नॉलेज बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जो हमें अचानक छोड़ कर चले गए ।

baba saheb Dr bheem Rao ambedkar 2022

जिनकी जाने से करोड़ों करोड़ों लोग दुख भरे आंसुओं से विलाप कर रहे थे यह खबर जब लोगों की कानों में पड़ी तो देश की सड़कों पर पैर रहने की जगह भी नहीं बची थी क्योंकि हमारे मसीहा का पार्थिव शरीर दिल्ली से मुंबई लाया जाना था क्योंकि अंतिम संस्कार मुंबई में ही होना था देश के विभिन्न शहरों गांवों से रेलगाड़ियों बसों व अन्य साधनों से लोगों की भीड़ मुंबई पहुंच रही थी देखते ही देखते अरब सागर वाली मुंबई जनसागर में तब्दील हो गई। बाबा के अंतिम दर्शन की लालसा में जनसैलाब रोते बिलखते जवान बूढ़े बुजुर्ग बच्चे छाती पीट पीट कर रो रहे थे महिलाएं चिल्ला रही थी कि हमारे पिता चले गए बाबा चले गए अब इस दुनिया में हमारा कौन है। जब हमारे मसीहा को चंदन की चिता पर रखा तो करोड़ों करोड़ों दिल करुण क्रंदन से तड़प रहे थे जब मेरे पिता मसीहा की चिता जली तो करोड़ों करोड़ों लोगों की आंखें बरसने लगी हमारे मसीहा की जलती हुई चिता को देख कर देश के करोड़ों करोड़ों देशवासियों के दिलों के अग्नि कुंड जल रहे थे। हमारे मसीहा ने हमारे हाथों से छीन लिए कासे मिट्टी के बर्तन और हमारे हाथों में पकड़ा दी कलम लिखने के लिए एक नया इतिहास आंखों में बसा दिए थे नए सपने होठों पर सजा दिए थे नए तराने और धमनियों में प्रवाहित कर दिया था नया जोश और जुनून कुछ कर गुजरने के लिए हमारे मसीहा की चिता तो चल रही थी अरब सागर के किनारे लेकिन देश के हर गांव शहर के किनारे में जल रहा था हर एक श्मशान देश के हर गांव शहर में भूखे प्यासे लोग बैठे थे अपने मसीहा कि चिता की आग ठंडी होने का इंतजार कर रहे थे। वह कौन सी आग थी। वह आग थी असमानता की धज्जियां उड़ा कर समानता स्थापित करने की यह पानी तालाब पर लगाई हुई आग मनुस्मृति को जलाने की आग इधर नागपुर की दीक्षाभूमि पर मातम बिखरा था लोगों की चीखें सुनाई दे रही थी कि आज हमारा मसीहा भगवान हमेशा के लिए चला गया आधुनिक भारत का वह सुपुत्र जिसने भारत जैसे देश में लोकतंत्र का बीजारोपण किया जिसने भारत जैसे देश का संविधान रच कर भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया था हर नागरिक को समानता स्वतंत्रता शिक्षा और न्याय का अधिकार दिया था वोट देकर देश का मालिक बनाया था उसी महामानव के अंतिम दर्शनों के लिए जनसैलाब मुंबई की सड़कों पर बह रहा था भारतीय संस्कृति में तुच्छ कहलाने वाली नारी जाति को हिंदू कोड बिल के सहारे बाबासाहेब ने संविधान में उनके लिए हक और अधिकार सुरक्षित किए ऐसी लाखों माताएं बहने उस समय श्मशान में मौजूद थी रामेस्वर सिंह P -540उन माता बहनों का वह दृश्य रूढ़िवादी सड़ी गली परंपराओं के मुंह पर एक जोरदार तमाचा था। क्योंकि जिन माता बहनों को श्मशान में जाने का अधिकार नहीं था हमारे मसीहा के अंतिम दर्शन हेतु उस समय तीन लाख महिलाएं वहां मौजूद थी। ऐसे थे हमारे महान ज्ञान के सागर महान समाज शास्त्री अर्थशास्त्री इतिहास के जानकार मानव विज्ञान की दाता संपूर्ण वेदों ग्रंथों पुराणों का अध्ययन करने वाले लेखक उच्च कोटि के पत्रकार मानव अधिकारों के संरक्षक विश्व के सभी देशों के संविधान ओं का अध्ययन करने वाले कानून के विशेषज्ञ आधुनिक भारत के निर्माता महान राजनीतिज्ञ भारतीय संविधान के रचयिता सिंबल ऑफ नॉलेज भारत रतन बोधिसत्व परम पूजनीय बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जीके 66 में परिनिर्वाण दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और कोटि कोटि प्रणाम नमन करते हैं ।


आपका अपना छोटा भाई
रामेश्वर सिंह पत्रकार
जिला संवाददाता बीआई24 न्यूज़ जनपद कासगंज उत्तर प्रदेश


 

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